संपादकीय | आशुतोष सोनी,
आजकल अपने मुंह से अपनी तारीफ करना कोई असाधारण कला नहीं रह गई है। बल्कि कहिए तो यह अब जीवन की उन सरल और साधारण आदतों में शामिल हो चुकी है, जिन्हें करने के लिए किसी विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं पड़ती। बस थोड़ा-सा आत्मविश्वास चाहिए, सामने दो-चार श्रोता चाहिए और फिर शुरू हो जाइए—हमने ऐसा किया, हमने वैसा किया, हमारे जैसा कोई दूसरा नहीं। सामने वाला बेचारा कुछ कहने की कोशिश करे, उससे पहले ही अपनी उपलब्धियों की पूरी कहानी उसके सामने रख दी जाती है। इसी आदत के लिए तो जमाना बड़े प्यार से कहता है—मुंह मियां मिट्ठू।
लेकिन मेरे मन में अक्सर एक बड़ा मासूम-सा सवाल उठता है कि आखिर ये लोग अपने मुंह से अपनी तारीफ इतनी आसानी से कैसे कर लेते हैं? मैंने भी कई बार सोचा कि आज अपने बारे में दो अच्छे शब्द खुद ही कह दूं, लेकिन जैसे ही पहला शब्द मुंह से निकलने को हुआ, भीतर से स्वाभिमान ने धीरे से कान में कहा—रहने दे भाई, पहचान बताने की जरूरत नहीं है, पहचान होगी तो लोग खुद पहचान लेंगे। बस फिर मैंने भी अपनी बात वापस रख दी। आखिर अपनी पहचान बताने और अपनी पहचान बनाने में थोड़ा तो फर्क होना चाहिए।
वैसे मुंह मियां मिट्ठू होना भी अपने आप में बड़ी दिलचस्प प्रजाति है। यह किसी एक वर्ग, पेशे या क्षेत्र तक सीमित नहीं है। आपको यह प्रजाति हर जगह मिल सकती है—कहीं कम, कहीं ज्यादा, कहीं मुस्कुराती हुई तो कहीं पूरे आत्मविश्वास के साथ। फर्क सिर्फ इतना है कि कोई अपनी तारीफ धीरे-धीरे करता है और कोई अपनी उपलब्धियों का ऐसा परिचय देता है जैसे दुनिया को उसकी जानकारी का इंतजार ही था।
हालांकि यहां एक बात साफ कर देना जरूरी है कि मैं मुंह मियां मिट्ठू का अर्थ किसी के झूठ बोलने या ज्यादा फेंकने से नहीं ले रहा हूं। यह तो बस इंसान की उस खूबसूरत आदत पर मेरा छोटा-सा व्यंग्य है, जिसमें कभी-कभी इंसान अपनी कहानी का लेखक भी खुद होता है, संपादक भी खुद और समीक्षक भी खुद। कहानी चाहे कितनी भी शानदार क्यों न हो, जब लेखक खुद ही बार-बार तालियां बजाने लगे तो सुनने वाले के चेहरे पर मुस्कान आ ही जाती है।
कभी-कभी तो लगता है कि दुनिया में भले ही अनगिनत प्रकार की प्रजातियां हों, लेकिन मुंह मियां मिट्ठू की प्रजाति सबसे आसानी से पहचान में आ जाती है। इनकी खासियत भी बड़ी अद्भुत होती है। ये अपनी पहचान बताते नहीं, समझाते हैं। अपनी तारीफ करते नहीं, सुनाते हैं। अपनी छवि बनाते नहीं, बल्कि खुद ही उसका उद्घाटन कर देते हैं। और सबसे मजेदार बात यह कि इनका आत्मविश्वास इतना आत्मनिर्भर होता है कि इन्हें किसी प्रमाणपत्र की भी विशेष आवश्यकता नहीं पड़ती।
लेकिन भला हम कौन होते हैं किसी को रोकने वाले? जिसे अपनी तारीफ खुद करने में आनंद मिलता है, उसे करने दीजिए। आखिर खुशी भी तो जीवन का जरूरी हिस्सा है। मैं तो बस किनारे बैठकर मुंह मियां मिट्ठू के इस अद्भुत संसार का आनंद लेता हूं और मुस्कुरा देता हूं। क्योंकि मेरा मानना है कि अपनी पहचान बताने से ज्यादा खूबसूरत है—अपनी पहचान बनाना।
क्योंकि वास्तव में तो मैं कुछ भी नहीं—सिर्फ मानव रूपी इंसान हूं। बाकी पहचान समय, कर्म और लोगों की नजर पर छोड़ रखी है। और अगर कभी मुझे भी अपने मुंह से अपनी तारीफ करते देख लें, तो समझ जाइएगा कि मुंह मियां मिट्ठू की प्रजाति में मेरा भी प्रवेश हो चुका है। फिलहाल तो मैं बाहर ही अच्छा हूं—मुस्कुराता हुआ, अपना काम करता हुआ और अपनी पहचान को खुद बोलने का इंतजार करता हुआ।



