पब्लिक सूत्र (आशुतोष सोनी)।
जमाना बदला, मिलने-मिलाने के तरीके बदले, मीटिंग्स डिजिटल हुईं और दोस्तों की बातें मैसेज ग्रुप्स तक सिमट गईं—लेकिन हर बातचीत का आखिरी पड़ाव वही एक कड़क अदरक वाली चाय हुआ करती थी मगर जनाब, अब तो लगता है कि इस राष्ट्रीय पेय को किसी की काली नज़र लग गई है!
वजह बहुत साफ है—शक्कर साहिबा ₹64 प्रति किलो के ऊँचे आसन पर विराजमान हो चुकी हैं। अब गणित समझ से परे है। एक तरफ पर्यावरण का प्रेम छलका और गाड़ियों के लिए 10% एथेनॉल मिक्स पेट्रोल को बढ़ावा दिया गया। विचार नेक था, मगर एथेनॉल बनाने के चक्कर में गन्ने का ऐसा इस्तेमाल हुआ कि सीधे रसोई का डिब्बा ही खाली हो गया। गाड़ियाँ तो अब एथेनॉल पीकर तेज़ी से दौड़ रही हैं, मगर आम इंसान के मुँह का स्वाद पूरी तरह फीका पड़ गया है।
वैसे, महंगाई की लीला भी बड़ी अपरंपार है, यह कभी अकेली नहीं आती। शक्कर के दाम क्या बढ़े, बाज़ार में महगाई की आवाज आने लगी। जलेबी और रसगुल्ले अब सिर्फ हलवाई के शीशे के पार से देखकर खुश होने की चीज़ रह गए हैं। सामने रक्षाबंधन का त्यौहार नज़दीक है, ऐसे में तो लगता है कि इस बार भाई-बहन के इस पावन रिश्ते की मिठास भी शक्कर के भाव देखकर थोड़ी कम ही हो जाएगी। त्योहारों में लगने वाले तिल और किचन के बाकी राशन के दाम भी आसमान छूने लगे हैं। रसोई गैस सिलेंडर साहब पहले ही आसमान में पतंग उड़ा रहे थे, अब शक्कर ने उन्हें नीचे से और ढील दे दी है।
लेकिन सिक्के का एक उजला पहलू यह भी है कि शायद सरकार हमारी सेहत को लेकर जरूरत से ज्यादा फिक्रमंद हो गई है। जितनी महंगी शक्कर होगी, लोग उतनी कम चाय पिएंगे, जिससे डायबिटीज पर अपने आप लगाम लग जाएगी। मुमकिन है कि यह बिना किसी औपचारिक घोषणा के चलाया जा रहा देशव्यापी ‘शुगर-फ्री’ मिशन हो! इसके अलावा जब चाय की चुस्कियां कम होंगी, तो सुबह-सुबह पेट में होने वाली एसिडिटी की समस्या से भी लोगों को राहत मिल जाएगी।
इसका सीधा असर अब हमारी मेहमाननवाजी और सामाजिक जीवन पर भी दिखने लगा है। पहले घर आते ही मेहमानों से पूछा जाता था—”चाय कड़क लेंगे या हल्की?”, लेकिन अब नया शिष्टाचार आ गया है—”पानी लेंगे या सिर्फ ताजी हवा?” मेहमान भी अब काफी समझदार हो चुके हैं, वे चाय की माँग करके मेज़बान को धर्मसंकट में डालने के बजाय सीधे सेहत की बातें करते हैं और हवाखोरी करके निकल लेते हैं।
कुल मिलाकर बात यह है कि देश भले ही गाड़ियों की टंकी में एथेनॉल भरकर रफ्तार पकड़ रहा हो, मगर आम आदमी फिलहाल अपनी फीकी प्याली में ‘फिटनेस’ की मिठास ढूँढने पर मजबूर है। खैर, मुँह का स्वाद छूटे तो छूटे, कम से कम बिना शक्कर की चाय पीकर हम ‘हेल्दी’ कहलाने का झूठा संतोष तो पाल ही सकते हैं।



